प्रातःकाल उठने के बाद स्नान से पूर्व जो आवश्यक विभिन्न कृत्य हैं, शास्त्रों ने उनके लिए भी सुनियोजित विधि-विधान बताया है। गृहस्थ को अपने नित्य-कर्मों के अन्तर्गत स्नान से पूर्व के कृत्य भी शास्त्र-निर्दिष्ट-पद्धति से ही करने चाहिए।
अतएव यहाँ पर क्रमशः जागरण-कृत्य एवं स्नान-पूर्व कृत्यों का निरूपण किया जा रहा है।
1 ब्रह्म-मुहूर्त में जागरण
सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जाग जाना चाहिए। इस समय सोना शास्त्रों में निषिद्ध है।
"ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी"
(ब्रह्म मुहूर्त की नींद पुण्य का नाश करने वाली होती है।)
2 करावलोकन
आँखों के खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुए निम्नलिखित श्लोक का पाठ करें —
कराग्रे वसति लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्यभाग में सरस्वती और मूलभाग में ब्रह्माजी निवास करते हैं, अतः प्रातःकाल दोनों हाथों का अवलोकन करना चाहिए।
3 स्नान
उसके बाद उठकर अपने नित्य-नियम अनुसार शौच, दन्तधावन (ब्रश), स्नान आदि पूरा करके घर में मन्दिर के सामने बैठ जाएँ (साथ में जल का लोटा रखें)। तदनन्तर यह मन्त्र बोलें —
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
4 शुद्धिकरण (आचमन)
उसके बाद जल के लोटे में से दाएँ हाथ से चम्मच द्वारा तीन बार ऊपर से जल का आचमन करें। प्रत्येक बार जल के आचमन से पूर्व यह मन्त्र पढ़ें —
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
विष्णोः पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥
प्रत्येक आचमन में क्रमशः बोलें:
- ॐ केशवाय नमः —(आचमन)
- ॐ माधवाय नमः —(आचमन)
- ॐ गोविन्दाय नमः —(आचमन)
अन्त में ॐ हृषिकेशाय नमः कहते हुए बाएँ हाथ से चम्मच में जल लेकर दाएँ हाथ को धो लें।
5 श्रीमद्-भगवद्-गीता पाठ
उसके बाद श्री गीता जी का पाठ अवश्य करना चाहिए — अधिक समय न हो तो कम से कम एक अध्याय, कुछ श्लोक अथवा एक श्लोक का अर्थपूर्वक पाठ करना चाहिए।
6 मन्त्र जप
गीता पाठ के पश्चात् अपने गुरु-मन्त्र का अथवा अपने इष्ट देवता के मन्त्र का तीन माला कम से कम जप करना चाहिए। (गुरु के दिये हुए मन्त्र का ही जप करने से मन्त्र की सिद्धि होती है एवं फल की प्राप्ति होती है।)
जप से पूर्व यह माला-मन्त्र द्वारा माला की पूजा करनी चाहिए —
अविघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।
मालां च गृह्णामि दक्षिणे करे॥
माला पूरी होने के बाद नीचे दिए मन्त्र से चम्मच से एक बार पृथ्वी पर जल छोड़कर किया हुआ मन्त्र जप देवता/देवी को समर्पित कर दें —
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणऽस्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादात् परमेश्वरः॥
(यदि देवी का मन्त्र हो तो "गुह्यातिगुह्यगोप्तृ" और "परमेश्वरी" का प्रयोग करें।)
7 प्राणायाम
नीचे लिखे मन्त्र का मानसिक जप करते हुए वाम (बाईं) नासिका से शनैः शनैः श्वास भीतर लेना है (पूरक), श्वास भीतर लेने के बाद उसे रोककर (कुम्भक) मानसिक रूप से एक मन्त्र का जप करना है, तथा पुनः मन्त्र जप करते हुए धीरे-धीरे श्वास को बाहर छोड़ना है (रेचक)।
इस प्रकार एक प्राणायाम होता है। ऐसे कम से कम 21 प्राणायाम करने चाहिए।
प्राणायाम मन्त्र:
ॐ भूर् ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्।
ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
ॐ आपो ज्योति रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्॥
यह प्रातःकाल का नित्य-नियम है जिसमें अधिकाधिक 30 से 40 मिनट लग सकते हैं।
इससे जीवन में आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधिदैविक तापों की शान्ति होती है एवं आनन्द की प्राप्ति होती है।
8 भोजन के समय
जब भी आप भोजन करने बैठें, तब भोजन प्रारम्भ करने से पहले दाएँ हाथ में ग्लास में से थोड़ा जल लेकर यह मन्त्र बोलें —
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाऽहुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
इस ब्रह्मकर्म रूपी यज्ञ में अग्नि भी ब्रह्म ही है, हवि भी ब्रह्म ही है एवं अर्पणकर्ता भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार जो सर्वत्र ब्रह्म भावना करता है उसे ब्रह्म भाव की प्राप्ति होती है। भोजन के समय इस मन्त्र का पाठ करने से अन्न के दोष दूर होते हैं।
इस मन्त्र को मानसिक अथवा वाचिक रूप से बोलने के बाद थाली में से पाँच छोटे-छोटे ग्रास (कौर, निवाले) खाने चाहिए और प्रत्येक ग्रास के साथ क्रमशः बोलना चाहिए —
- ॐ प्राणाय स्वाहा
- ॐ अपानाय स्वाहा
- ॐ व्यानाय स्वाहा
- ॐ समानाय स्वाहा
- ॐ उदानाय स्वाहा
हमारे शरीर में पाँच मुख्य प्राण होते हैं, इसलिए यह पञ्च-ग्रास आहुति देवताओं को समर्पित करनी चाहिए। यह नियम दोनों समय के भोजन के लिए है।
9 रात्रि में शयन से पूर्व
रात को सोने से पहले अपने इष्टदेव अथवा गुरु-चरण-कमल का चिन्तन करना चाहिए।
॥ इत्योम् शम् ॥